kuchh kahein kuchh sunein
शनिवार, 6 अप्रैल 2013
..........दानव तेरे भीतर ".........
सारी नदी सोख ली तूने एक घूँट में ..
फिर भी कहता --मेरी प्यास अधूरी है !
और कहाँ से लाऊं सागर
आखिर मेरी भी
कुछ तो मजबूरी है !!
तेरा क्या है
तेरी भूख ने
जब पहाड़ तक निगल लिए हैं !
अंधड़ बनकर
बड़े पेड़ क्याछोटे पौधे मसल दिए हैं !!
तेरी चीखों सेनिरीह जन
भयाक्रांत हो थर थर कापें !!
तेरे भीतर के
दानव को डर डर मापें !!
तू खुदको समझे
कितना ही बलशाली !
किन्तु एक दिन
बल निर्बल हो जाना है
तुझको भी कांधे पर उठकर
दूर देश जाना है !!.............स्पर्शी, ग्वालियर .....
नई पोस्ट
पुराने पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
संदेश (Atom)