तुम चुप क्यों हो तुम्हारे बोलने से खिल रहा मौसम यहाँ था कि तुम्हारे शब्द शब्द पुष्प थे जैसे तुम्हारे बोल ही थे .. ढोल जैसे बज रहे थे मन रहा त्यौहार जैसा था तुम्हारी बात में खोकर ये भूला कि संसार कैसा था न जाने क्या प्रलोभन था न जाने कैसा बंधन था कि तुम अब क्या कहोगी क्या रचोगी और मैं उत्तर अगर दूंगा तो हा हा कर हंसोगी अचानक लब तुम्हारे सिल गए कैसे अचानक से बरसना बादलों का थम गया कैसे किसी कोयल के गीतों की अचानक चुप हुई गुनगुन मेरा सब हो गया चुप साँस भी चुप और धड़कन भी है चुप चुप सी बताओ तो जरा मुझको कि तुम चुप क्यों हो मैं खुद से पूछता हूँ कुछ तो उत्तर ही नहीं मिलता तुम्हीं से पूछता हूँ तुम कहो बतलाओ तो मुझको कि तुम चुप क्यों हो ये लब खोलो ..कि खुल जाएँ पुनः जज्बातों के रिश्ते कुछ तुम बोलो तो जीवन में पुनः उम्मीद सी लौटे .. जरासी आह्ट तो दे दो जरासी सी दे तो दो दस्तक जरा कुछ बोल दो अभी कुछ बोल दो रुकाओ मत पवन नदी के रास्ते तुम खोल दो सारे यहाँ मंदिर के घंटे तक नहीं गूंजे जो तुम चुप हो यहाँ पूजा के मन्त्रों क़ी भी चुप चुप सी हैं आवाजें कोई कुछ बोलता है कान मेरे सुन नहीं पाते जो तुम चुप हो तो कोई ख्वाब तक हम बुन नहीं पाते धरा बेजान सी है ..और सारा आस्मां चुप है सभी में फूंक दोगी प्राणवायु तुम जो चुप्पी तोडोगी सभी का मौन टूटेगा जो तुम कुछ बात बोलोगी जरा जल्दी से बतलाओ .कि क्यों हो चुप ....चुप क्यों हो . राहुल गुप्ता, ग्वालियर 9826347016
तुम चुप क्यों हो
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खिल रहा मौसम यहाँ था
कि तुम्हारे शब्द शब्द पुष्प थे जैसे
तुम्हारे बोल ही थे ..
ढोल जैसे बज रहे थे
मन रहा त्यौहार जैसा था
तुम्हारी बात में खोकर
ये भूला कि संसार कैसा था
न जाने क्या प्रलोभन था
न जाने कैसा बंधन था
कि तुम अब क्या कहोगी
क्या रचोगी
और मैं उत्तर अगर दूंगा
तो हा हा कर हंसोगी
अचानक लब तुम्हारे सिल गए कैसे
अचानक से बरसना
बादलों का थम गया कैसे
किसी कोयल के गीतों की
अचानक चुप हुई गुनगुन
मेरा सब हो गया चुप
साँस भी चुप और धड़कन भी है
चुप चुप सी
बताओ तो जरा मुझको
कि तुम चुप क्यों हो
मैं खुद से पूछता हूँ कुछ
तो उत्तर ही नहीं मिलता
तुम्हीं से पूछता हूँ
तुम कहो बतलाओ तो मुझको
कि तुम चुप क्यों हो
ये लब खोलो ..कि खुल जाएँ
पुनः जज्बातों के रिश्ते
कुछ तुम बोलो तो जीवन में
पुनः उम्मीद सी लौटे ..
जरासी आह्ट तो दे दो
जरासी सी दे तो दो दस्तक
जरा कुछ बोल दो
अभी कुछ बोल दो
रुकाओ मत पवन नदी के
रास्ते तुम खोल दो सारे
यहाँ मंदिर के घंटे तक नहीं गूंजे
जो तुम चुप हो
यहाँ पूजा के मन्त्रों क़ी भी
चुप चुप सी हैं आवाजें
कोई कुछ बोलता है कान मेरे सुन नहीं पाते
जो तुम चुप हो तो कोई
ख्वाब तक हम बुन नहीं पाते
धरा बेजान सी है ..और
सारा आस्मां चुप है
सभी में फूंक दोगी प्राणवायु
तुम जो चुप्पी तोडोगी
सभी का मौन टूटेगा
जो तुम कुछ बात बोलोगी
जरा जल्दी से बतलाओ .कि
क्यों हो चुप ....चुप क्यों हो .
राहुल गुप्ता, ग्वालियर 9826347016